
हर ग्रह पर बारिश का स्वरूप उसके वातावरण पर निर्भर करता है। अगर आपके कोई दोस्त विज्ञान के शौकीन हैं, तो यह संदर्भ उनके लिए उपयोगी हो सकता है।

सौरमंडल में बारिश होती है हीरे और एसिड की कहानी का प्रवाह और मुख्य तथ्य
सौरमंडल के ग्रहों पर बारिश का स्वरूप पृथ्वी से बिल्कुल अलग है। वायुमंडल, तापमान और दबाव के अनोखे मिश्रण के कारण यहां एसिड, हीरे, सूखी बर्फ और मीथेन के कण बारिश के रूप में गिरते हैं। पृथ्वी के जल-चक्र के विपरीत, अन्य ग्रहों पर बारिश की प्रक्रिया जीवन के लिए अनुकूल नहीं है।
शुक्र पर सल्फ्यूरिक एसिड के बादल होते हैं, लेकिन अत्यधिक गर्मी के कारण बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले वाष्पित हो जाती हैं। इसे 'विरगा' कहते हैं। मंगल पर कार्बन डाइऑक्साइड के क्रिस्टल गिरते हैं, जिसे 'सूखी बर्फ' की बर्फबारी कहा जाता है।
बृहस्पति और शनि जैसे गैस दानवों में अमोनिया और पानी की बारिश हो सकती है, लेकिन ठोस सतह न होने के कारण यह गहराई में घुल जाती है। शनि, अरुण और वरुण पर उच्च दबाव और बिजली के कारण मीथेन से कार्बन बनता है, जो हीरे के कणों में बदल सकता है।
प्लूटो पर बारिश नहीं, बल्कि नाइट्रोजन और मीथेन की बर्फ के कण धीरे-धीरे सतह पर जमते हैं। यह प्रक्रिया वास्तविक बारिश नहीं, बल्कि हल्की बर्फबारी जैसी है। इन घटनाओं को सीधे नहीं देखा गया है, लेकिन वैज्ञानिक मॉडल और प्रयोगशाला परीक्षण इन्हें संभव मानते हैं।
तथ्य
- शुक्र पर सल्फ्यूरिक एसिड की बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले 460°C की गर्मी में वाष्पित हो जाती हैं, जिसे 'विरगा' कहते हैं।
- मंगल पर कार्बन डाइऑक्साइड के क्रिस्टल 'सूखी बर्फ' के रूप में गिरते हैं, लेकिन अक्सर सतह तक नहीं पहुंच पाते।
- शनि, अरुण और वरुण पर मीथेन उच्च दबाव और बिजली में कार्बन में बदलकर हीरे के कण बना सकता है।
- बृहस्पति के ऊपरी वायुमंडल में अमोनिया के बादल हैं और नीचे पानी के बादल, लेकिन ठोस सतह न होने के कारण बारिश गहराई में घुल जाती है।
- प्लूटो पर तरल बारिश लगभग असंभव है; वहां नाइट्रोजन और मीथेन के कण बर्फ की तरह गिरते हैं।
- पृथ्वी के अलावा किसी ग्रह पर जीवन के लिए अनुकूल जल-चक्र नहीं है।
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